3.9.10

फिल्म - छोटी सी बात

कल टी वी पर अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा कि फिल्म छोटी सी बात देखि .......... वैसे तो ये फिल्म पहले कई मर्तबा देख बैठे हैं......... पर कल पता नहीं एक ब्लोगर के मूड से देखी होगी....... पता नहीं.

फिल्म का ऊ हिस्सा बढिया लगा जब तक प्रभा (माला सिन्हा) को अरुण (अमोल पालेकर) नहीं पटा पा रहे था . .......... कैसे दब्बू सा बन्दा .......... पता नहीं क्या क्या सोचता है ...... पर जब प्रभा सामने आती है तो सांप सूंघ जाता है.......... शायद १९७० के ज़माने में ऐसा ही होता होगा ये तो हमें ६०-६५ साल के ब्लॉगर भाई बतायेंगे....... अगर कोई है तो .......

बेवकूफी वाला जमाना.......... दब कर रहना........ हालांकि ये बॉम्बे कि स्टोरी है.............. जहाँ कि सामाजिक परिवेश दिल्ली जैसे शहर से १० एक साल आगे चलता है. जिस परिवेश में हम लोगों का जन्म हुवा है या जहां हम बड़े हुवे है वहाँ तो कसम से १९९० तक यही दब्बूपण वाला जमाना था....... ये भगवान भला करे नरसिम्हा राव का जिसने मनमोहन सिंह को घर की खिडकी दरवाज़े खोलने के लिया कहा और खिडकी दरवाज़े खुलने कि देर थी कि शाहरुख खान जैसे लौंडे दीपा साही जैसी माया मेमसाब से सरे आम इश्क लड़ाने लग गए थे........ मैं मानता हूँ कि इससे पहले और भी फिल्मे आयी होंगी – इसी टोपिक पर – पर अपन ने जो देखी उसकी बात कर रहे हैं.

आप कह रहे होंगे कि बात तो प्रभा और अरुण से चालू हुई थी...... पता नहीं बाबा कहाँ रुख करते हैं........ कहीं नहीं........

खुद अपनी याद आ गई..................

ये बात सत्य कि छोटी सी प्रेम-कहानी में अपन घोषित कर चुके हैं कि इश्क-और प्यार वाली गली से बाई-पास हो कर निकल गए .......... अपन का ऐसा-वैसा कोई चक्कर नहीं था..........

पर ये भी सत्य है कि कहीं न कहीं अपन के हृदय के तार स्पंदित होते थे. और अरुण कि तरह सोच कर सोच रह जाते थे......... दोस्तों के साथ हंसी मजाक में तो खूब तीर छोड़े जाते पर ........... जंग-ए-मैदान में सब बेकार हो जाते थे. दिल कि बात सिर्फ दिल में ही रह पाती थी. .........


इस चालबाज़ दुनिया में अरुण को तो कर्नल जुलिअस नागेन्द्रनाथ सिंह जैसा उस्ताद कहैं या फिर गुरु मिल जाता है जिससे न केवल उसे अपना प्यार प्रभा मिल जाता है अपितु भावी जीवन में इज्ज़त और दबंगपन से जीने के गुर भी सीख जाता है.


पर अपन को आज तक ऐसा गुरु नहीं मिला.


इस फिल्म ने असरानी ने जो नागेश कि भूमिका निभाई है........ उस प्रकार के व्यक्तित्व से मैं आज भी त्रस्त हूँ.............. अरे-अरे --------------- वो प्यार के मामले मैं नहीं ....... दीन दुनिया के मामले में. ..... जहाँ जाते हैं – लुट कर आ जाते हैं. चाहे ... फल-सब्जी वाला हो, किरयाने वाला या फिर कपडे वाले का शो रूम हो...... दिल्ली शहर में इत्ते बड़े-बड़े माल बन गए है......... पर यकीन मानिए मैं आजतक इन माल में नहीं गया ................ मात्र इसलिए .......... कि कहीं मुझे लपेटा न जाए ....