17.9.10

पर दिल है कि मानता ही नहीं.

बहुत सोचा था – अब ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखेंगे....... काम पर ध्यान देंगे......

पर दिल है कि मानता ही नहीं.


आज पता नहीं क्यों

चाहता हूँ - तुम्हे थोडा डिस्टर्ब करू.........

जज्बातों का पत्थर फैंक कर ..

तुम्हारे ह्रदय के दरवाजे पर knock करूं

कुछ ऐसा करूं कि

दिमाग की शांति

छुटी पर चली जाए.........

और दिमाग के सारे

बर्तन, कपडे तुम खुद धोवो

परेशान होते हुवे तुम्हे मैं

दूर उस शितिज से निहारूं ........

तुम्हारे माथे पर उभरी

पसीने की बूंदे जो ..........

कमल के फूल पर ओंस मानिंद

मोती सी चमकती हैं

ऐसे में मैं निहारूं, .......

जो मेरे नयनों को

सकूं दें सकें


डिजाईन बनाते-बनाते जब ह्रदय के तारों को किसी की याद छेड़ जाती है – तो कविता हो जाती है.

क्या आप भी यही मानते हैं ....

जय राम जी की