22.9.10

आज के दो बैल - सन्दर्भ मुंशी प्रेमचंद.

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है, किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता है, पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुःख, हानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं, पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर!


कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए , भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है ? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया। लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है। और वह है बैल

प्रस्तावना पढ़ ली आपने – प्रेमचंद द्वारा लिखित कहानी – दो बैलकी.

पता नहीं क्यों जब में अपनी तुलना करने लगता हूँ तो मुझे ले दे के बैल ही नज़र आते हैं. और हाँ – एक दोस्त के शब्दों में रहंट के बैल. जिनको पानी निकालने के लिए जोता जाता था. उनकी आँखों में पट्टी नुमा कोई चीज़ बंधी जाती थी ताकि – वो दायें बाएं न देख सकें. ये भी न देख सकें कि मालिक है या नहीं – बस चलते जाएँ. गोल गोल –

फैक्ट्री से घर – घर से फैक्ट्री.

बिलकुल बैल कि तरह. दुनिया भर का बोझ उठाये. वजन ज्यादा या कम – ये हमारी किस्मत पर निर्भर करता है – कब गाडीवान को रुई लादने का भाड़ा मिला है या लोहा. अपना कुछ नहीं. अगर अपने कहने को है तो – मात्र किस्मत. जो अपनी होती तो बैल कि योनी में जन्म न लिया होता – अगर बैल कि योनी में जन्म लिया ही था – तो कोई धर्मात्मा छुडवा देता सांड कि शक्ल में – धर्म के नाम पर. पर नहीं खालिस बैल- बोझा उठाने को.

हाँ बैल चार पहिया वाले होते इन – और हम है दुपहिया.

अब वर्तमान पर आते हैं. दिल्ली में नारायणा रेड लाइट का एक दृश्य:

भारी लोहे के गार्डरों से बैल गाड़ी लदी हुई है. गाडीवान तीसरी कसम का राजकपूर नहीं है और ना ही प्रेमचंद का होरी या झूरी है. वो खालिस गाडीवान है जो उत्तर प्रदेश के किसी जिले का है और अभी २० वर्ष से दिल्ली वाला हो गया है, वो दारू के नशे में धुत है. लोहे के गार्डर जहाँ खत्म होते हैं वहाँ एक लालटेन – लाल चमकीले पनी में लपेट कर लटका रखी है. बेक लाइट का काम करने के लिए.

आजकल बैल भी समझदार हो गए हैं. रेड लाइट पर रुक गया है. बैलगाडी के पीछे कोई अमीरजादा अपनी लंबी होंडा सिटी गाड़ी में विलायती महेंगी शराब के नशे में मद हो कर होर्न पर होर्न दिया जा रहा है. और बैलगाडी के बगल में मैं अपने लड्डा (सेलेक्ट स्कूटर) पर बैठा सब देख रहा हूँ. बैल जानवर जरूर है पर है समझदार – पता है रेड लाइट है आगे नहीं बढ़ रहा. अमीरजादा बेखोफ सा गाडीवान को गाली देता है और गाडीवान की देसी शराब उतर जाती है – वो बैल पर दो चार डंडे से बरसाता है.

पर बैल को पता नहीं क्या डर है? आगे नहीं बढ़ रहा. गाडीवान के बैल की पुरुष ग्रंथि पर वो डंडा तेज तेज घुमाने पर बैल सरपट चल पड़ता है. पीछे से अमीरजादा भी निकल जाता है – ओवर टेक करके. मैं अपनी जगह मनमोस कर रह जाता हूँ. क्योंकि कुछ दर्द है – जो बैल की पुरुष ग्रंथि से होकर मेरे हृदय को कचोट रहा है.

दिन याद आया २००६ का दशहरा. झांकी सजाने के लिए १० बैलगाडी बुलाई थी. एक का गाडीवान दारू पी कर पता नहीं कहाँ चला गया था. और पूरी शोभा यात्रा में वो बैल गाडी मुझे हांकनी पड़ी थी.

जय राम जी की


चित्र : गूगल के साभार.