21.9.10

बोल मेरी मछली कित्ता पानी

एक गोल चक्कर बनाकर – एक दूसरे का हाथ पकड़ कर गोल गोले घूमते बच्चे बोलते.......

हरा समंदर – गोपीचन्द्र

बोल मेरी मछली कित्ता पानी

और बीच में जो बालक रहता – वो अपने घुटने तक हाथ लगता हुवा बोलता

इतना पानी

इसी प्रकार फिर से वो बोलना चालू करते – और बीच का बच्चा – कमर तक इशारा करता हुवा कहता इतना पानी

याद आपको भी आ गया होगा. बच्चपन का वो खेल. हाँ, आजकल मीडिया के सभी लोग यमुना के किनारे हाथ पकड़ कर गोल गोल घूम रहे हैं. और बोल रहे है – बोल मेरी मछली कित्ता पानी. सुबह से शाम तक बकते रहते हैं. यमुना खतरे कि निशान के इतना उपर – उतना उपर. दिल्ली में बाढ़??

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दिल्ली वालों, यमुना नदी – अपनी जगह मांग रही है – उसकी जगह खाली करो.


इतनी मीटिंग और आपातकालीन बैठक बुलाई जा रही है. इतने मास्टर प्लान बन रहे हैं. पर एक बात – नदी का पेटा जो दिल्ली के सेवर कि सिल्ट से भर गया है कभी उसको साफ़ करवाने की किसने सोची? सिल्ट से कम से कम १ मीटर गहराई तो कम हो गई है. नदी का विस्तार भी कम कर दिया है. किनारों से रेत खत्म हो गई है. मानसून के दौरान वजीराबाद बैराज से बहुत सा पानी बेकार चला जाता है. और अनुमानित यह पानी दिली जल बोर्ड द्वारा सप्लाई किया जाने वाले पानी के चार गुना होता है. नदियाँ जो पहाडो से रेत बहाकर लाती है .... वो अपने किनारों पर जमा करती है जिससे ज्यादा पानी आने से इसी रेत द्वारा सोंख लिया है.


यमुना कि इस रेत को रेत के ठेकेदारों ने नहीं बक्शा....... बाकि नदी में रह गई – सीवर कि सिल्ट. वो कहाँ से पानी सोखेगी. पहले यही नदियों कि रेत को अगर २-४ फूट खोदा जाता तो पानी मिल जाता था.



कहते हैं प्रकृति अपना समाधान खुद करती है – यमुना को हिल्लोरे मारने दो. बहने दो – ये तुम्हारी गंदगी ही तो साफ़ कर रही है.

मीडिया वालों बार बार टोक कर नज़र मत लगाओ.

जी हाँ पहले इसी नदी के कारण हमारी दिल्ली पानीदार थी – और दिल्ली वाले भी. अब दिल्ली वाले बेशर्म मालदार हैं और धरती बाँझ – कंक्रीट से भरी हुई.

सुबह बारिश आ रही थी - इसलिए घर बैठ कर टीवी देख रहा था - और परेशान होकर ये पोस्ट यमुना मैया पर लिखी - जय राम जी की.

फोटो : गूगल के साभार.