17.11.10

कित्ता ही आसान ..... और कितना मुश्किल.

मित्रों, कई बार कहीं ऐसी कविता या कुछ पंक्तियाँ मिल जाती है कि आपके दिल को छू जाती है. आप उसको इग्नोर नहीं कर सकते..... कुछ सोचने पर मजबूर करती है : 
कित्ता आसान है – किसी के एड्रेस बुक में स्थान पाना, पर
कितनी मुश्किल आती है दिल में जगह बनाने के लिए

कित्ता आसान है – किसी की गलती गिनना, पर
कितनी मुश्किल आती है अपनी गलती ध्यान आने में
कित्ता आसान है – बिना सोचे समझे बोलना, पर
कितनी मुश्किल आती है अपनी जबा को संभालने में.
कित्ता आसान है अपने किसी प्रिय को दुखी करना, पर
कितना मुश्किल है किसी जख्मी दिल को मोह्हबत से भरना
कित्ता आसान है – किसी को भी क्षमा कर देना, पर
कितना मुश्किल होता है किसी से क्षमा माँगना...
कित्ता आसान है – कोई नियम बनाना, पर
कितना मुश्किल होता है – इसे स्वयं पर लागू करना..
कित्ता आसान है – सपने देखना, पर
कितना मुश्किल है  उनको पूरा करना ...
कितना आसान है विजयोत्सव मनाना , पर
कितना मुश्किल है उसी गरिमा से हार स्वीकार करना...
कित्ता आसान है – किसी से वायदा करना, पर
कितना मुश्किल हो जाता है – उसे पूरा करना..
कितनी आसानी से हम गलती करते हैं, पर
कितना मुश्किल है – उन गलतियों से सीखना..
कित्ता आसान है – बिछुड़ों के लिए रोना, पर
कितना मुश्किल है – उनको संभालना जो नहीं बिछुडे....
दिन में कितनी बार हम कुछ इमप्रोवमेंट के लिए सोचते हैं
पर लागू करना कित्ता मुश्किल है..
कितना आसान है शब्दों की दोस्ती करना , पर
कितना मुश्किल होता है इन्ही शब्दों के अर्थ के साथ निभाना....

कितना आसान .... कितना मुश्किल ...... वाकई आसान - बहुत ही आसान और मुश्किल - बहुत ही मुश्किल....... ये पंक्तियाँ कह लो या फिर कविता.... इ-मेल से प्राप्त हुई थी.. उसे अनुवाद कर के  आपसे बाँट कर कुछ प्रसन्नता अनुभव कर रहा हूँ....... 

सही में, कित्ता आसान है किसी के मज्मूम को छापना, पर कित्ता मुश्किल हो जाता है खुद दो-शब्द लिखना.....

जय राम जी की.....