19.11.10

असली जूता, ..... इव्नेबतुता – बगल में जूता...... वाला नहीं

‘जूता’
इव्नेबतुता – बगल में जूता ....... वाला नहीं
     जो रिंग रोड मायापुरी फ्लाई ओवर से उतरते वक्त बेदर्द वाहन चालकों से सताया हुआ .. कुचला हुआ ... सड़क के बीचो-बीच पड़ा मिला था ....... वही वाला.
     सड़क पर पड़े एक बेकार से जूते को देखकर पता नहीं क्यों मेरे दिमाग में हलचल सी मच गई..... ये जूता अपनी बुरी से बुरी दशा में था.. काले रंग रहा होगा कभी ... फिलहाल मिटटी में लथपथ सा था..– फीता भी था ... जूते के उपर फीते के लिए कुल छ: छेद थे– और फीता मात्र ३ छेदों में ही था....
       रिंग रोड पर ट्रेफिक ज्यादा था उसी जगह स्कूटर रोकना मुनासिब नहीं था... अत: थोडा आगे जाकर स्कूटर एक किनारे रोका और वापिस आकर वह जूता उठा कर पटरी पर रख दिया... जूते में सोल भी लगा था – कुछ अटपटा सा लगा.. ‘सोल’....... बचपन में १ साल जूता पहनने के बाद जब घिस जाता था तो मोची से जूते में सोल लगवाया जाता था.. जिससे से उसे अगले १ साले के लिए कुछ जीवन मिल जाता था.
      जूता कोई १५०-२०० रुपये की कीमत वाला लग रहा था... जूता उद्योग में आई क्रांति कि वजह से आजकल कोई भी जूते में सोल नहीं लगवाता. क्योंकि जूते सस्ते पड़ते हैं. (ब्रांडेड को छोड़ दें तो). ... पता किस शख्स का जूता होगा? जिस दिन नया खरीद कर लाया होगा – उस दिन शायद नए कपडे भी खरीदें हो... और हो सकता किसी शादी–वादी में जाना हुआ हो.... दो चार लोगों ने पूछा भी होगा.. क्यों भाई, नया जूता लाये हो  
कहाँ से लाये
कित्ते का लाये आदि आदि...
       यानी इस जूते ने अच्छे दिन भी देखे होंगे... हो सकता उस शख्स ने किसी के पुराने जूतों को हिराकत की नज़र से भी देखा होगा ... तो उस समय यही जूता अपनी पोजीशन पर कितना इतराया होगा... धीरे धीरे ही ये घीसा होगा.... फैक्टरी (या कार्यस्थल) में आने जाने में.... इतवार को कुछ सोद्दा-सट्टा लाने में .... कहीं दस दिन के बकाया वेतन के लिए चक्कर लगाए होंगे. छोटे को जब बुखार हुआ था तो सरकारी डिस्पेंसरी पर चक्कर लगे होंगे. हो सकता है .. कहीं लाल झंडे वाले कम्युनिस्ट यूनियन के चक्कर में पड़ गया हो...... तो पता नहीं लेबर कोर्ट में कित्ते चक्कर लगाए होंगे.
       हो सकता है वो शख्स किसी की मय्यत में भी शामिल हुआ हो और ये जूता शमशान या फिर कब्रिस्तान की सैर का आये हों..... खुदा न करे ... वो शख्स कहीं जेबकतरे या चोरी-चाकरी में नप गया हो तो हो सकता है – बड़ी ‘हवेली’ के दर्श भी कर आया हो ... पर ये उम्मीद कम ही दिखती है ... क्योंकि अगर इस जूते का भूतपूर्व मालिक इतना ‘शातिर’ होता तो जूते पर सोल न लगवाता... स्स्सला नया खरीदता. 
      कुछ समझ नहीं आ रहा...... अत: में जूते को इज्ज़त से पटरी पर रख कर स्कूटर स्टार्ट कर के चल देता हूँ. .. पर मन ही मन उस जूते को याद करता हूँ.... जो इतिहास बने... जिन पर कैमरे क्लिक हुए... जो अगले दिन की अखबारों में सुर्खियाँ बने....... जैसेकि : 

अमेरिका प्रधानमंत्री  जॉर्ज डब्लू बुश पर....   पत्रकार मुंतजर अल जैदी का जूता......
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पर.... ब्रिटेन में – अनाम शख्स का जूता...
जम्मू एवं कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर...  अब्दुल अहद जन, निलंबित हेड कांस्टेबल का जूता....
भारत के गृहमंत्री पी चिदंबरम पर....  पत्रकार जनरैलसिंह का जूता......

       ये सभी जूते पूजनीय हैं..... वंदनीय है....... हो सकता है अभी कहीं सरकारी 'मालखाने' की इज्ज़त बड़ा रहे हो.
      जब मैंने वह जूता इज्ज़त से पटरी पर रखा तो बस एक ही बात मन में आई........ काश उपर उल्लेखित चार जोड़ी जूतों में कोई एक जूता मुझे मिल जाता तो .... संभालकर रख लेता.....सुबह साइकिल ब्रांड २ अगरबत्ती रोज जलाता.... 
      आप सब पत्रकार लोगों से गुजारिश है...... जब भी आप प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री, खाद्यमंत्री, इस सरकार की सर्वेसर्वा कठपुतलीचालक 'राजमाता' या फिर कोई भी मंत्री पद से सुसज्जित व्यक्ति, अगर उनकी प्रेस कांफ्रेंस में जाओ तो कृपा अपने जूते को मौका दो... और जूता मुझे दो........ पूजा के लिए.......
      जाते जाते एक बात और याद आ गयी ...... "सत्ता के दलालों को ... जूता मारो सालों को"

जय राम जी की.
Photocourtsey: www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/08/100815_omer_shoe_ac.shtml