25.11.10

मेरे हमराह .. मेरा साथ दोगे

मित्रों जरूरी नहीं कि आपका हमराह सदा आपके साथ ही चले, कुछ शिकवे हो सकते हैं, कुछ शिकायते भी.. और बीच मजधार में जब यही शिकवे और शिकायते .... कसमे वायदों पर भारी पड़ती हैं तो मुहं से आह निकलती हैं :
प्रस्तुत हैं कुछ पंक्तियाँ, अगर आप कविता का नाम दे दो तो अपने को धन्य मानूंगा.

मेरे हमराह .. मेरा साथ दोगे.
राह में मेरे साथ चलोगे..
वायदा निभाओगे...
इस कंटक पथ में
विचलित तो नहीं होवोगे..
मेरे हमराह .. मेरा साथ दोगे.

मैं नहीं जानता रस्मे-ऐ-जमाना...
मैं नहीं जानता दस्तूर-ऐ-मोहब्बत
मुझे नहीं मालूम मंजिल अपनी
मैं एक आवारा बादल सा,
क्या मेरा साथ निभावोगे..
मेरे हमराह .. मेरा साथ दोगे.

इन बारिशों में पानी बहुत है
इन नदियों में न-उम्मीदी का आलम
मेरी पतवार भी टूटी और
मेरी कश्ती भी बीच भंवर में...
मेरे हमराह ..  क्या फिर भी तुम
मेरा साथ दोगे?

तुफानो के काले साये यूं..
रोशन नहीं होने देते राह को
ये कडकती बिजलियाँ भी..
काली अमावस की रात में
नहीं दिखाती राह भी...
तो क्या, मेरे साथ चलोगे..
ऐ मेरे हमराह .. मेरा साथ दोगे ?

लिख तो दिया, पर मैं अभी भी यही मानता हूँ कि अगर हम सफर या फिर हम राह ठान ले  कि वो आपके 'हम कदम' रहेंगे, तो कोई भी मुश्किल डिगा नहीं सकती.

जय राम जी की.