27.11.10

ये दिल्ली है साहेब.......

    ये दिल्ली है साहेब........... यहाँ चकाचौंध है.... बड़े बड़े खेलों की, मीडिया के कैमरों की, आसमान छूती बिल्डिंग में बड़ी कंपनियों के साइन बोर्ड की....... एकदम चमाचम....
    कहा जाता होगा किसी जमाने में, दिल्ली है दिलवालों की... पर आज नहीं .. आज दिल्ली है संगदिल लोगों की....... संगदिल ...... चाहे पैसे और रुतबे से कित्ते भी बड़े क्यों न हो.... चाहे उन्होंने अदब और साहितियक  दुनिया में कित्ते ही बड़े झंडे बुलंद न कर रखे हों......... चाहे कित्ते ही बड़े समाजसेवी और मानवाधिकार और पर्यावरण, जाने क्या-क्या, के कार्यकर्ता और अधिकारी हों...... पर सब संगदिल......... बाहर का दिखावा एक दम मस्त.... पोलिश .... पर एक छोटा-सा दायरा ... उसके अंदर किसी को भी आने की आज़ादी नहीं.... और न ही साहेब लोग उस दायरे से बाहर जाते है ... एक बनावटी मुस्कान ... कागज के फूलों-सी हरएक सूटेड-बूटेड टाई पहने इंसान के मुंह पर है..........

       महंगे ब्रांडेड महकते कपडे में लोगों के काले-काले दुर्गन्ध मारते दिल ... चमचमाते चेहरे..... लंगर.... दान........ गुरुपुरव, साईं संध्या, विशाल भगवती जागरण है यहाँ. ......... हरेक की प्रधानी चमक रही है..... कालकाजी मंदिर, बंगला साहिब, शीश गंज साहिब, हनुमान मंदिर, शनिमंदिर में लगती लंबी कतारें...... सूटेड-बूटेड प्राणाम - ये नतमस्तक हैं. .... पापों से छुटकारा चाहने के बाद........ दारू और मुर्गे के साथ आबाद होती किसी भी फार्म-हाउस और बियर-बार में रंगीन शामे........ रात १२ बजे तक दिन है साहिब.. अब कौन क्या कर रहा है किसी को क्या मतलब? अपना सौदा देख.
     सुबह की टेंशन ......... ऑफिस, उधारी कारों (इंस्टालमेंट) की लंबी कतारें, ट्रेफिक जाम – एवेरज १० कि.म. प्रति घंटा.... एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड का शोर - कोई मरे तो मरे ......... लबालब मेट्रो........ भागते इंसान... दम तोडती सिटी बस. परेशान करते ऑटो रिक्शा वाले.. दिल्ली है साहेब.......... गुजारा करोगे - तो खरीदो कार और लगो क्यु में .... १५ किलोमीटर के ऑफिस में पहुँचो शान से १ घंटे में.... टाई पहन कर – सूटेड बूटेड.... आप अपनी सहुलि़त के लिए नहीं जी रहे ......... आप सहुलि़त पाने के लिए जीते हो यहाँ पर........ साध्य ही रास्ता है साधन तक पहुँचने का..... उलटी गंगा है - ये दिखावटी अमीरी है साहिब...
  यहाँ पर बहिन-बेटी, बुडे माँ-बाप – सब बराबर ... धक्का मुक्की........ चैन स्नेचिंग, बैंक-रोबरी , लूटमार, बलात्कार.......... जो हो जाए वो कम है. अब बारी है दुसरे तबके की ....... उनके पास अगर किस्तों पर कार है तो हमारे पास चोरी की............ वो फार्म-हाउस में रंगीन शामे गुज़ार रहे हैं तो अपन भी दारू पी कर बलात्कार से ही गुज़ारा कर रहे है..... आदमी पिस रहा है अपने सपनो में ... अपनी आकांक्षाओं में...... जो कि गाँव में उधार लिए थे....... और दिल्ली में लुटा रहे है........
नेता मस्त है - पुलिस पस्त है ... दबंग जी रहा है...... कर्मो से पूज रहा है.

आओगे साहेब...... मेरी दिल्ली में .......

अपने सपने गाँव में पूरे करना जी.... मत आना इन सपनो के शहर .. यहाँ तो सुना है श्रवण कुमार ने भी माता पिता से किराया मांग लिया था..... यमुना भी यहाँ आकर थक जाती है....... 

ये दिल्ली है 
शान है
सत्ताधीशों की.......
दलालो की...... 
घोटालेबाजों की....
और दूषित मानसिकता लिए जाबाजों की......


आओगे यहाँ .... स्वागत है.....  


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