31.8.10

वह खुद स्टेडियमों में झाड़ू क्यों न लगा लें, पर ये तैयार होने वाले नहीं

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए कहा कि चाहे वह खुद स्टेडियमों में झाड़ू क्यों न लगा लें, वे समय पर तैयार होने वाले नहीं हैं.

मोदी ने आयोजन समिति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि अहमदाबाद का कोई भी सरकारी निकाय खेलों के प्रारंभ होने से पहले स्थलों को तैयार करना सुनिश्चित कर लेता। उन्होंने कहा, 'मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर क्या हो रहा है। यदि प्रधानमंत्री खुद भी फर्श साफ करना शुरू कर दें, खेलों के लिए स्टेडियम तैयार होने वाले नहीं हैं। उनके पास चार साल थे लेकिन वे अभी भी जूझ रहे हैं। उन्हें यह काम अहमदाबाद नगर निगम को दे देना चाहिए था। वह इन्हें समय पर तैयार कर देता।'

मैं सलामी देता हूँ.......... गुजरात के मुख्यमंत्री .. नरेंद्र मोदी को......... ठोक कर अपनी बात रखी बिना किसी लाग लपेट के..... आखिर ४ साल मिले थे........ राष्ट्रमंडल (माफ कीजियेगा...... भ्रस्तमंडल) खेलों के लिए............ पर इन लोगों ने अंतिम समय को ही क्यों चूना .......... आज हाथ पैर फूल रहे हैं...... १ रुपे का सामान १०० रुपे में माँगा रहे हों.......... समय रहते क्यों ये सब नहीं क्या......

एक बात अगर समय रहते ये कार्य कर लेते तो कमाने के अवसर प्रदान नहीं होते.......... और इन लोगों को राष्ट्रिय गौरव कि आड़ में रूपये बनाने का पुराना नुस्का मालूम है.........

लानत भेजता हूँ इस कथित राष्ट्रीय गौरव ध्वजवाहक सेना पर .......... जब एक मुख्यमंत्री मात्र नगर निगम के दम पर ताल ठोक सकता है तो इनके पास तो दिल्ली नगर निगम, डी डी ए, पी डब्लू डी, दिली सरकार , केंद्र का शहरी विकास मंत्रालय .... और न जाने क्या क्या था............ उसके बाद भी ढाक के तीन पात........ इन्होंने खेलों के कभी दिल से लिया ही नहीं....... बस पैसा बनाने कि सोची है.......... उपर वाला देख रहा है. ............

दिल के उसी अँधेरे कोने से ....... दुस्वपन आता है ........ यमुना नदी ...... सारे स्टेडियम को घेर रही है... पानी में डुबो रही है.......... उसके हाथ में बेनर होता है “पहले मेरी जगह खाली करो” ........ पानी चारो और फ़ैल रहा है............ सोनिया गाँधी ......... मनमोहन सिंह को घूर रही है.......... मनमोहन सिंह शर्म से मरे जा रहे है ........ किसी को कुछ भी नहीं कह पा रहे हैं............. बिलकुल ............. निसहाय से............. राष्ट्रिय गौरव नाम कि पतिकाए जो .... खेलमंत्री , शहरी विकासमंत्री, दिल्ली कि मुख्यमंत्री के हाथों चिटक कर ............ पानी में बह रही है......... खिलाड़ी बीयर पि रहे है......... रहमान साहेब ऊँचा ऊँचा गा रहे है ........ बहुत तेज संगीत बज रहा है........ और हमारे पडोसी ताली बजा रहे है...............

बहरहाल जय राम जी की.........

किसन भैया को चिट्ठी ...... "जन्माष्टमी के उपलक्ष में"

आदरणीय किसन भैया ....

मैं यहाँ कुशलता से हूँ और आपकी कुशलता परमपिता ने नेक चाहता हूँ. यहाँ आपको सब याद करते हैं. जब से आप यहाँ से गए हो – दुबारा आये नहीं – आपने तो कहा था “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥“

भैया परिवार बड़ा हो गया वो आप जिन जंगल में गैया को चराने जाते थे....... उ जंगल भी अब नहीं रहे. अपने ही घर के लोगों ने जंगल काट कर खेत बना दिए है. गैया सब कि हालत खराब है...... इहाँ चारा तो रहता नहीं है तो दूध निकालने के बाद हम उन्हें गलियों में भेज देते हैं – वहाँ कचरा- पोलिथिन वगैराह खा कर जान दे देती है. कुछ विधर्मी घर में आकर रहने लग गए थे .... उ अब उनको काटने भी लग गए है...... भैया गैया का उद्धार आपको करना पड़ेगा.

पूतना को तो आप मार गए थे ......... पर अब उसी के परिवार कि एक और डायन आ गई है – महंगाई डायन. छोटे छोटे बच्चों से दूध खींच रही है...... खाना नहीं खाने दे रही....... लोग भूखे मर रहे है. पूतना तो बस आपकी जान के पिच्छे पड़ी थी ... ई डायन तो सबको परेशान किये दे रही है.

आपके जाने के बाद फिर यमुना जी में प्रदुषण रूपी कालिया घुस आया है. जो कालिया दाह आपने किया था.. उससे तो बहुत जहरीला है. इसके तट पर आपके खेलने के स्थान पर कुछ लोगों नें जबरन कब्ज़ा कर लिया है.

जरासंघ जैसे लोगों से परिवार फिर फल फुल रही हैं. अब ये भष्ट्राचार के रूप में कु-ख्यात हो चुके है.
दुशासन के परिवार कि हरकते अब बढ़ गई है. मामला पहले तो राज दरबार में चीर-हरण तक सिमित था – पर अब तो गली गली – में उससे आगे हो रहा है.

कौरव फिर युद्ध उन्मंत हो रहे है...... आपके सभी भाइयों से जंगल-जमीन खींच रहे हैं.............. हम साधनहीन हो चुके है....... उ लोग फिर सत्ता के मद में अंधे हो कर हमें खदेड़ रहे है.

उत्तर पूर्व में जो पडोसी है – बहुत जाबर हो रहे हैं.... रोज रोज – हमारी जमीन पर कब्ज़ा करने को तैयार रहते हैं. उत्तर पश्चिम के पड़ोसियों का तो क्या कहना..... हमरे परिवार के ही छोटे सदस्यों को हतियार वगैरा दे कर ...घर में उत्पात मच्वाते हैं.

भैया चिट्ठी को तार समझना और तुरंत आने वाली करना. तनिक भी देर कि – तो सब परिणाम ही भयानक होंगे.

बातें बहुत से हैं - इस चिट्ठी में क्या क्या लिखें। बाकी बातें आपके आने पर ही होंगी। प्रणाम

आपका छुटकू
दीपक

29.8.10

मेरे आज के हीरो की कहानी - गरीबी और बदनसीबी.

आज तक समझ नहीं आया - गरीबी और बदनसीबी का आपस में कनेक्शन ....... मानो – मोबाइल फोन और केश कार्ड – मकान कर किराया और बीमार बीवी...

है न सही कनेक्शन......... ये एयरटेल, वोडा, रिलायंस या टाटा का कनेक्शन भी नहीं है ........ की १० रुपे के रिचार्ज से थोड़ी खुशी मिल जाए. ये पोस्ट पेड है बाबू..... पहले मौज करो .... फिर जब ८००-१००० का बिल आ जाए तो सर पर हाथ रख कर रोवो.....

रामपाल सामने बैठा अपनी बता रहा है और मेरा भावुक मन इन्ही ...... गरीबी और बदनसीबी की तंग और सीलन भरी गलियों में घूम रहा है.

क्या बताएं भाईसाब, बड़े बेटे को बैटरी की दूकान खोल कर दी पर दूकान पर उसका मन नहीं लगता था.... दूकान ठप्प कर के रख दी. ........ सारा दिल CRPF, BSF, CISF आदि के फार्म भरने के लिए डोलता रहता है........... मेरे छोटे भाई का बेटा भर्ती हो गया है... ट्रेनिंग पर गया हुवा है..... भाई बोला दलाल सही है मेरे बेटे को भर्ती करवा दिया है........ ८०,०००० रुपे लिए थे ... पर काम हो गया.. तेरे बेटे के लिए बात करता हूँ. मेरे हामी भरने पर उसने अपनी जेब से ६०,००० अग्रिम दिए........... जो मेरे हिसाब की कापी में दर्ज हो गए........... पर पता चला की वो दलाल ६०,००० लेकर भाग गया और मेरे बेटा रह गया.......... फिर पुलिस की भर्ती निकली.......... फिर एक दलाल मिला ..... बोला रुपे लगगे ३ लाख........... २ लाख पहले दे देना.... बाकि एक लाख ट्रेनिंग पर जाने से पहले.................

मेरे दिल के उसी अँधेरे कोने से फिर किसी महान विचारक की बातें आने लग गई ...... आशा बड़ी ठगिनी, बड़ी मृदु व मधुरभाषिणी. बहुत बुरे दिनों में भी मनुष्य के काम में लगातार कहती है – “ये तूफ़ान और बादल हमेशा नहीं रहेंगे – तुम दुखी क्यों होते हो ? मेरी बात सुनो”


अब व्यवस्था करनी थी ३ लाख की........ समझ से परे ... कहाँ जाएँ ... किसके हीले बैठें... .. रामपाल बोला............... समधी से बात की..... विचार जानने के लिए ....... समधी साहिब .... पहुंचे हुवे पीर थे ........ बोले तू चिंता मत कर ........ मैंने बात कर रखी है और १ लाख दे भी दिया है......................

चलो, चिंता से मुक्ति मिली........... परिणाम आ गए और मेरे बेटा रह गया......

अब कुछ तस्सली मिलती है ५-७ महीने बाद २३ साल का हो जावेगा.......... ये भर्ती का भूत तो छूटेगा.

छोटे भाई की एक केमिस्ट की दूकान है ........ दूसरे कसबे में ८-१० कमरों का जच्चा-बच्चा केन्द्र भी खोल रखा है.... ३ सुमो गाडी किराए पर चलती हैं उसका बड़ा बेटा .... BSF में है ...... छोटा भी भर्ती हो कर ट्रेनिंग में चला गया है. उनके ठाठ हैं.............

मैं घर में बड़ा था....... जिम्मेवारी मेरे पर ज्यादा ही........ एक प्रेस में कम्पोसिंग सीख ली थी वक्त के साथ साथ टाईपसेटिंग सीख कर लोकल अखबार में पड़ा सड़ रहे हूँ ......... पगार बढाने को बोलते हूँ तो कहा जाता है ........ नौकरी कहीं और देख लो...... ६३०० में क्या होता है.

दिल के उस्सी अँधेरे कोने में एक लाल झंडा फिर से लहराने लगता है ....... पर इससे तो आज तक किसी का भला हुवा नहीं ........ फिर वही किस्मत देवता को याद करता हूँ............. रामपाल की गाडी उसी बदनसीबी की पटरी पर ही धकिया कर चल रही है. ....... जहाँ से छोटे भाई की खुशनसीब गाड़ी बाय-पास होकर बरसों पहले निकल गयी.

पिछले कई दिन से ............ म्हारी बीरबानी की रीड की हड्डी में प्रॉब्लम थी..... इलाज़ चल रहा था......... भैसा-गाडी में अकेले बैठ कर जा रही थी ....... डाक्टर के पास...... रास्ते में भैंसा बिगड गया ......... वो नीचे गिर गई........ उसके सर पर भैंसे का पैर आ गया.......... ३-४ घंटे तो बेहोश रही........... इलाज़ करवाया......... सी टी स्कैन भी हुवा..... घर आ गए......... फिर दिककत आने लग गई ........ एम् आर में पता चला की दिमाग में ३-४ जगह खून के धब्बे बन गए है....................................... एक मुसीबत तो ठीक हुयी नहीं .... दूसरी सर पर आ गयी...... उसी के चक्कर में तो बेटे की शादी जल्दी कर दी....... ...

बेटा तो कुछ कमाता नहीं....... कुछ दिन बाद बल-बच्चेदार हो जायेगा........... उसका खर्चा और मेरे सर पर ही तो है. ३-४ बीघे जमीन आती है मेरे हिस्से ............. ये है की घर के खाने-पीने की कम्मी नहीं रहती.......... अब पता चल रहा है की सरकार और जे पी ग्रुप जमीन पर कब्ब्जा ले रहा है........

............... वो तो अपना फार्मा लेने आया था............... अभी जब वो जा चूका है मुझे परेशान कर के. सामने लंच बॉक्स पड़ा है पर मन कहीं और डोल रहा है........

दिल के उसी अँधेरे कोने में फिर से कवि अपनी बात कहने लग जाता है ....

दर्द ऐसा दरिया है दिल का .....
के बारिश रूठ भी जाए तो पानी कम नहीं होता........

क्यों इतने आंसू है......... क्यों मुस्कान नहीं है......... क्यों बाप की बदनसीबी एक ही बेटे को मिलती है ...... एक ही बेटे को क्यों विरासत में बाप की गरीबी मिलती है......... गरीबी और बदनसीबी का खुदा ने क्या अजब कनेक्शन बनाया है.........................

..........कुछ भी तो समझ नहीं आता..............................................

गरीब आदमी की लड़कियां ज्यादा होंगी....... पर लायक होंगी......... अगर लड़के होंगे तो नालायक होंगे... उसकी कुंवारी लड़की नहीं मरती........... चाहे जितनी भी बीमार हो जाये.

या तो खुद या फिर उसकी पार्टनर ....... किसी लंबी बिमारी से ग्रसित रहते हैं ..............

इज्ज़त के चक्कर में रिश्तेदारी में ज्यादा घुसते होंगे (पैसा कहीं से उधार लेकर) पर रिश्तेदार पूछते नहीं हैं.....


बहरहाल जय राम जी की....................

फिर लिखूंगा ........... अगर मन हुवा तो .............

फोटो : गुग्गल से (साभार)

28.8.10

शीला दीक्षित - हे दिल्ली की अर्राध्य देवी - तुम नमन है

हे हाईकमान नन्दनी, दिल्ली में आपके महंगाई जनक आदेशों से दबा हुवा शहरी होने के नाते में तुम्हे प्रणाम करता हूँ. मैडम जी, जिस प्रकार आप दिल्ली १९९८ से दिल्ली की बागडोर हाई कमान की इनायत से संभल रही हैं – उसे में अभिभूत हूँ – और आपके समक्ष नतमस्तक होकर आपको दुर्गेश नन्दनी की तर्ज़ पर हाईकमान नन्दनी के खिताब से नवाजता हूँ.

हे दिल्ली की अर्याध्य देवी- परसों आपको टी वी पर देखा था... मौका था दिल्ली के गौरव के बारे में एक गीत का विमोचन करने का, आप ‘माय री’ के पालेश सेन के साथ मंच पर थिरक रही थी. मैडम जी कित्ता अच्छा लग रहा था आपका पाश्चात्य दंग से नाचते हुवे. मैडम जी, दिल्ली जी जनता आप द्वारा आदेशित खुदे खड्डों में मर रही है...... कोई करंट लग कर मर रह है. कोई जाम में फंस कर मजबूर है – पर ये तो दिल्ली के शहरियों की भक्ति का नमूना है जो अपनी आराध्य देवी को अर्पित कर रहे हैं. आपको इन भक्तों की परवाह नहीं करनी चाहिए.

हे पक्ष-विपक्ष दिग्गज संहारनी- मैडम जी जब १९९८ में आप भाजपा का हरा कर कुर्सी पर बैठी तो कई दिग्गज आपके सन्मुख चुनोती के रूप में खड़े थे ...... पर आपने धीरे धीरे कांग्रेस और भाजपा दोनों के दिग्गजों का राजनीतिक संहार करके अपनी कुर्सी न केवल सुरक्षित की अपितु भविष्य के लिए पुख्ता भी कर ली.

हे पर्यावरण शुभ-चिन्तक वनदेवी- मैडम जी आपका पर्यावरण प्रेम भारत वर्ष में जाहिर है. आपने पर्यावरण को बचने के लिए पोलिथिन बैग पर बेन लगवा दिया. परन्तु ये सरलहृदयग्राही – आपसे मोटे-मोटे पेट वाले पोलिथिन बैग वाले व्यापारियों का दुखड़ा देखा नहीं गया ... इस वज़ह से ये कानून दिल्ली में पूर्ण रूपेण कार्यान्वित नहीं हो पाया. मैडम जी, कुछ देशभक्त लोग आपसे पोलिथिन लाबी से पैसा खाने की बात कर रही है.....पर वो करते हैं तो करे. अपन की बला से. तीसरी बार जब आपको उम्मीद नहीं थी और आप कुर्सी पर बैठ गई तो आपने ही ब्यान दिया था कि यमुना को लंदन की टेम्स नदी नहीं बनाया जा सकता है। यमुना नदी पर सभी पर्यावरणवादियों को आपने ओउकात बता दी थी.

हे विद्युतदेवी- दिल्ली में डेसू नामक एक संस्थान था – जो आज के डेंगू से भी ज्यादा खतरनाक था. आप ने डेसू को संमूल नष्ट कर के निजी बिजली कंपनियों को दिल्ली की रौशनी सौंप दी. पिछले साल दिल्ली की दो निजी बिजली कंपनियों ने कितना मुनाफा कमाया? ये पहली है और उसके बाद भी आप लगातार बयान देती रहती हैं कि दिल्ली वालों को बढ़ी हुई बिजली की दरों के लिये तैयार रहना चाहिये.

हे अपराधियों की रक्षाकवच ..... जेसिका लाल हत्याकांड में मनु शर्मा को आपने पैरोल पर छोड़ा था..... आपको क्या पता था की वो होटल के पब में जाएगा. इसके लिए आपको दिल्ली उच्च न्यालय से फटकार पड़ी तो क्या. आपका रक्षा कवच तो रहना चाहिए. अफजल गुरु को ही लें – जो अपराधी सुप्रीम कोर्ट तक से सजा पा चूका था शरण में आके ही उसको चैन मिला. जिस अपराधी जो फांसी की सजा मिल चुकी थी – उसको चार-साडे चार वर्ष का जीवन दान तो आपने दी दिया. मुस्लिम होते हुवे भी तो प्रात आपके नाम की चालीसा पड़ता है.

हे मद्य देवी – मैडम जी, ये तो आपकी इनायत है की दिल्ली के शराबियों को शराब आसान कर दी. जो शराब की दुकाने ८ बजे बंद हो जाती थी – वो रात्रि १० बजे तक खुली रहती हैं. अब शराब लेने के लिए जयादा चलना भी नहीं पड़ता ...... हर एक किलोमीटर के परिधि में दूकान उपलब्ध है. और दूकान के बहार बीयर पि भी सकते हैं. आपने शराबियों की समस्याएं खत्म कर दी.

हे स्वप्नद्रष्टा- दिल्ली को विश्वस्तरीय शहर बनाने का स्वप्न दिखा कर आपने खूब चुना लगाया. राष्ट्रमंडल खेलों के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई का करोड़ों रूपया भ्रष्टाचारियों की जेब में चला गया या घटिया निर्माण के कारण पानी में बह गया। आपने तो दलितों को भी नहीं बख्शा। उनके कल्याण के लिए योजनामद में रखी गई करोरो रूपए की धनराशि भी खेलों के नाम पर घपला करके हजम कर ली गई।

हे राष्ट्रगौरव ध्वजावाहक देवी- मैडम जी, आप ही के कंधे पर तो इस समय राष्ट्रगौरव की ध्वजा है. आप पर ही सारे देश और विदेश जी निगायें लगी है. आपके सभी कर्म इसी “राष्ट्रगौरव” की चादर में छिपे हैं. और आज आप पल्ला झाड रही है ....... आज आप कह रही हैं की ३ अक्टूबर तक निर्माण कार्य चलता रहेगा. इसी “राष्ट्रगौरव” के लिए दिल्ली वालों ने क्या क्या नहीं भुगता ......... पर आप पिछले २ महीनो से तारिख पर तारिख दी रहीं हैं.



फिर दिल के किसी कौने से .........
यमुना किनारे पानी में डूबी हुई झुगियों के लोगों आपने टेंट लगा कर फुटपाथ पर बसाया. भगवान आपका भला करे ........... पर पता नहीं आप कैसे भूल गई की इन लोगों से आपकी राष्ट्रमंडल खेलों में – रेशम पर टाट का पैबंद – सरीखा हो जायेगा..............

27.8.10

दिल्ली में हमारी लड़ाई लड़बे नया सिपईया आया है..


“बापू बापू बाहर निकालो - मैदान में आ”

“अरे का हो गया कलूया, काहे इत्ता हल्ला कर रहा है” दमलू अंदर से चिल्लाया ....

बापू गाँव के बाहर वाले मैदान में सभी लोग इकठ्ठा हैं... कह रहे हैं ... हमार नया सिपईया आया है.. दिल्ली में हमारी लड़ाई लड़ेगा... हमे दो बक्त की रोटी दिलाएगा।

बुडे दमलू की काले चेहरे और पकी चमड़ी में अंदर धंसी भावहीन आँखों में ... दो आंसू टपक आयी। ........

कलुवा चिंता में पड़ गया.. बापू तो तब भी नहीं रोये थे.... सरकार ने बड़ी फैक्ट्री के लिए जमीन ले ली थी. ३-४ दिन पुलिस से पिटने के बाद ... चुपचाप मजदूरी करने उसी बन रही फैक्ट्री में ठेकेदार के पास चले जाते थे. ........ आज बापू की आँखों में आंसू कैसे छ्हलक गए।
रे कलुवा, मेरे पिताजी जी बताते थे.. उस जमाने में एक सिपाही जरूर था .... एक धोती पहन कर ... और हाथ में एक लाठी ले कर आया था ... हमारे परगने में ...... वो जरूर दिल्ली जा कर हमारी लड़ाई लड़ा था. उसके बाद तो कोनों सिपईया नहीं आया ............ बस व्यापारी आये .......

कलुवा, अब तो ऐसे खद्दरधारी को देख कर चिंता हो जाती है............ काहे दिल्ली छोड़ कर हमारे गाँव आया है........... अरे कलुवा...... ई हमका का रोटी देगा......... जो खुद ही मांगे निकला है........ जो खद्दर पहिन कर ......... खुद हमारे जंगल – जमीन पर निगाह रख रहा है........... उ का हमका रोटी देगा ......... उ का हमरी लड़ाई लड़ेगा. ...................... बेटा ई लोग राज करने के लिए जनम लिए है ....... कोनों गरीब की लड़ाई थोड़ी लड़ेंगे.

छटपटाहट ...........
कितनी उस बीज की रही होगी......
जो किसी गरीब स्त्री की कोख में पनप रहा होगा
कितनी इर्ष्य से सोचता होगा.............
वहाँ एसी कमरे में बलशाली राजनीतिक स्त्री
के कोख में स्थापित होते बीज के बारे में
जो ९ महीने बाद जनम लेकर ...
२० वर्ष बाद देश की सत्ता का ...
हक़दार बनेगा.....
और
में पूर्ववर्ती बीज की तरह ......
फिर से खेतों में जोता जाऊंगा.
फिर में २ जून की रोटी को तरसूंगा

......... और उ आएगा मेरे गाँव ...
सिपाहिय बन के
मेरी २ जून की रोटी की आस लेकर
बीज-बीज में फर्क कैसे हो जाता है ?
..........................

कुछ कीजिये बाबु साहिब....... कुछ तो कीजिये.............. कल गाँव के गाँव, जमीन से बेदखल हो कर, ललचाई और आक्रोश से भरी इन आसमान छूती इमारतों....... महंगी गाड़ियों........... को भूखे पेट देखें ......... कुछ गलत कदम उठाये .............. उससे पहले कुछ कीजिए...............

फोटो : दी हिंदू के साभार............................

26.8.10

गृहमंत्री जी एक लाइन खींच रहे है .. भगवा आंतकवाद की.

पान की पीक खिडकी से थूकते हुवे माट्साब ने ब्लैक बोर्ड पर चाक से एक लाइन खींची ... और छात्रों से बोले की, बच्चो अब इस लाइन तो बिना काटे छोटा कर के दिखाओ. एक ग्रामीण सरकारी स्कूल में जहाँ सीमेंट के चद्दर की छतें दोपहर में तप रही थी... दरअसल ये १९८३ का वाक्या है।

छात्रों को कुछ समझ नहीं आया.. आज माट्साब क्या पदाने के मूड में है. पर माट्साब आज कक्षा ८ के विद्यार्थी को जीवन के गुर सिखने के मूड में थे. अंग्रेजों के ज़माने के माट्साब थे.. दीन दुनिया देख रखी थी..... पता था ... कल जीवन में मेरे छात्र कहाँ मार खायेंगे. क्यों न आज ही इनका जीवन दर्शन स्पष्ट कर दिया जाए.... आगे पता नहीं कितने बच्चे स्कूल जाना छोड़ देंगे.

बच्चों में प्रशन वाचक कातर नज़रों से माट्साब की तरफ देखा..... माट्साब होंठ बंदकर के मंद मंद मुस्कुराए ... दुबारा पीक खिडकी से फैंकते हुवे बोलना चालू किया...........
“इस लाइन के निचे मैं बड़ी लाइन खीच देता हूँ..... ये .. ये लो.... देखो मैंने उपर वाली लाइन के नीचे एक बड़ी लाइन खींच दी.......... अब उपर वाली लाइन छोटी हो गई न. मैंने उपर वाली लाइन को न तो काटा न डस्टर के मिटाया फिर भी वो नीचे वाली लाइन की अपेक्षा छोटी हो गई.”

........ दिमाग की मेमोरी इस कम्पुटर की मेमोरी से भी बहुत बड़ी है ........... पता नहीं कितनी जी बी की होती ... कोई अंदाजा नहीं.. आज सुबह से फिर दिमाग में वही माट्साब घूम रहे थे... वही लाइन वाली थेओरी............. बिलकुल हमारी राजनीति पर सटीक बैठती है.

............ एक लाइन सरदार बल्लभभाई पटेल थे... व्यवस्था ने उनको छोटा दिखने के लाइन कश्मीर का मुद्दा अपने हाथ में लिया और एक लंबी लाइन खींच दी. आज तक वो मुद्दा हाथ में पत्थर लिए खड़ा है. अब एक नए लाइन खींचने की तयारी है... स्वत्तता.

....... एक लाइन पंजाब में अकालियों की थी- व्यवस्था नें ठीक उसके नीचे भिंडरवाला की बड़ी लाइन खींच दी .. अकाली लाइन छोटी हो जाये. इसका हश्र सभी जानते ही हैं...

......... एक लाइन महाराष्ट्र में बाल ठाकरे थे. उनके नीचे एक लंबी लाइन खींच दी – राज ठाकरे की. चलो बाल ठाकरे तो छोटे हुवे. बाल ठाकरे को निपट नहीं पाए ... अब राज ठाकरे को निपटो. (सोचा ये था – दोनों लड़ मरेंगे.)

......... झारखण्ड में एक छोटी लाइन थी – भाजपा की... सभी नें मिल कर एक बड़ी लाइन खींच दी मधु कोड़ा के नाम की. जो खुद ही व्यवस्था बन कर पूरा राज्य ही लील कर गया.

........ भुखमरी की एक लाइन खींची हुई थी.. गरीबी रेखा के रूप में .... अब उनके खेत, जंगल लेकर एक और बड़ी लाइन खींच दी गयी. अब तक रोटी को रोते थे. अब जंगल जमीन को रो। रोटी तो नहीं मांगोगे – गोदामों में गेंहू सड़े तो सड़े.

.......... एक लाइन खींची थी – लालचोक कश्मीर से – लालगढ़ – पश्चिम बंगाल तक आंतकवाद की --- अब व्यवस्था के प्रतीक गृहमंत्री जी एक लाइन खींच रहे है .. भगवा आंतकवाद की.


दिल की आवाज.............
यानि की ये स्वंतंत्र भारत की मिसाल है की जो समस्या हल न हो तो एक और बड़ी समस्या पैदा कर दो... कम से कम लोग पुरानी समस्या तो भूल जायेंगे। एक दो व्यक्तियों की बगावत को ये माननिये भगवा आंतकवाद की परिभाषा दे रहे हैं।

23.8.10

हम तो झंडू बाम हुए ... बाबू साहिब तेरे चक्कर में

इस मायावी दुनिया में सभी लोगों की नहीं चलती बाबू साहिब – अब पता चल गया. हमरे बापू खूब समझाते थे... बेटा ई दुनिया में पैसे और रसूख वाला आदमी ही इज्ज़त से जी सकता है – जरा संभल कर चलना।

महंगाई डाइन के चक्कर में हमऊ नें भी फैक्ट्री मालिक में हल्ला बोल दिया. मालिक से कह दिया ... पगार बढाइये. पूरी दुनिया में सबसे गरीब सांसदों की तनख्वाह बढ़ गई है तो हमुकी भी बडनी चाहिए. मालिक नें इनकार कर दई... अपने रोना रोने बैठ गई... फैक्ट्री में काम नहीं है... किराया बहुत है.. कम्पीटीशन का ज़माना है ... मशीन पुरानी है.... प्रोड़कशान निकल नहीं पाती... .................. बस का बताई हमर दिल भी बैठ गया. पर का करी.... पगार न बडवाते तो ऊ ससुर लाल झंडे वाले कामरेड दिमाग झनझना देत रहे. ..........

हमका कछू समझ न आई.......... या तो उ कामरेड लोग का सुनी .... या दिल का सुनी... या फिर मालिक साहिब का दुखडा देखि. चाय का दूकान पर अखबार में बाबु साहिब, आपके बारे में खबर पढ़ ई ..

“वेतन में पांच गुना तक बढ़ोतरी की मांग को लेकर विरोध कर रहे विपक्षी सांसदों ने संसद स्थगित होने के बाद समानांतर सरकार बना डाली। लालू यादव को प्रधानमंत्री चुना गया और मुलायम सिंह यादव को गृहमंत्री बनाया गया। इतना ही नहीं भाजपा नेता गोपीनाथ मुंडे को लोकसभा अध्यक्ष बना दिया गया। ‘

बस फिर का था.... हमूऊ जोश में आ गए....... तुरत फुरंत फैक्ट्री गए ....... और मालिक साहिब की कुर्सी पर धसिया कर बैठ गए............... और मालिक का चश्मा लगा कर खुद को फैक्ट्री का मालिक घोषित कर दिया. ................ ई रामदीन इहाँ आवा..... ए किश्न्वा..... औ अनिलवा... तुम भी. सबो लोग अपना अपना कापी लेइय आवा.... आज के मालिक हम.... सभो का पगार बड़ा दिया जावेगा. ................. खूब मजा आवा.... मन ही मन शुक्र किया आपका .... आपहो की आइडिया चल गया .............. हमारे मन में खूब आया की आप प्रधानमंत्री बन सकते हैं तो हमू भी फैक्ट्री के मालिक काहे नहीं बन सकते सरकार.

पर उ फैक्ट्री में एक तो ........ चम्च्वा रही मालिक का ........... तुरंत – फुरंत मालिक के फोन हुई गवा............... और मालिक आ धमके फैक्ट्री में .... हमका उठा कर गेट से बहार फेंकवा दिया गया. हम अपनी जिंदगी पर रो रहे है ............... जब हमे गेट से बहार फेक्वा दिया गया तो आपको क्यों नहीं संसद से बहार निकाला गया .... ई तो लोकशाही है बाबू.... कानून सबके लिए बराबर है....... महात्मा गाँधी दिला गए हैं आज़ादी ... पर आपकी पगार १०,००० रुपे बड गयी और हम बेरोजगार हो गए.............. काश अपने बापू की बात मानी होती। दुनिया को देख भाल कर चले होते।

बाबू साहिब .............. रेडियो पर गाना बज रही है .... मुन्नी बरबाद हुई – राजा तेरे लिया ......... और हमरा दिल खूब रो रहा है ............. क्योंकि हम तो झंडू बाम हुए बाबू तेरे चक्कर में।

20.8.10

बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे (पगार बढ़ गई है)

“छट्ठे वेतन आयोग के बाद तो तनख्वाह बढ़ गई है साहिब – अब हम गरीब आदमियो से थोड़ी दया दिखाया कीजिये” एक ट्रक का कुलिनेर चुंगी पर पर बैठे बाबु से बोला. जाहिर सी बात बाबु का जवाब गलियों से आया होगा।

आज जब हमारे सांसदों का वेतन बड़ा है तो उपरोक्त टिपण्णी याद आ गयी. आज जनता सवाल भी कर रही है “बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे।”

“साहेब जितना पैसा मिलता है – उतना काम तो करोगे?” हल्ला गुल्ला कर के संसद थप तो नहीं करोगे।

“पहेले पूरी नहीं पड़ती थी ... महीने के आखिर में पैसा खत्म हो जाता था. आप घूस खा कर सवाल पूछते थे, बाबू साहिब हम भी आप की मजबूरी समझते थे. – बाबू साहिब, अब तो घूस नहीं खावोगे।”

“साहिब हमे तो मीट-चिकन खाए हुवे मुद्दत हो जाती है. आप को तो संसद में १०-१५ रुपे में चिकन मिल जाता है” क्या अब उस गरीब कैंटीन वाले के भी रेट बारहवा दोगे?”


साहिब २ दिन पहले फैक्ट्री में नाईट शिफ्ट में नींद आ गयी थी – मालिक ने पगार में दिहाड़ी काट ली – बोला साला फैक्ट्री को संसद समझ कर सो गया था.” सरकार आप की पगार बढ़ गई है – तो संसद में सोया तो नहीं करोगे। '


बाबू साहिब बताइए...

हमारे हमारे भी सवाल है – जवाब दीजिए ..... (कम पगार होते हुवे भी हम बिना घुस खाए सवाल पूछ रहे है.) आप की शक्ल डेड साल पहले देखि थी. अभी तो सादे तील साल रहते है... फिर आप हमारे पास आयेंगे. तब तक तो महंगाई डयान और बड़ी हो जायेगी और पगार फिर कम लगने लगेगी. साहिब इस डयान को मरवा क्यों नहीं देते.

जैसे की जो काम आप कानूनी रूप से नहीं करवा पाते – उसके लिए किसी गुंडे को सुपारी दे देते हो।
माए बाप इस महंगाई डयान को मरवाने की सुपारी कब देंगे।

आपसे ये नाचीज़ सवाल पूछ बैठा – गुस्ताखी करने की माफ़ी चाहता है.

19.8.10

राष्ट्रमंडल खेल - चोर उचक्के चोधरी ते लुच्ची रन प्रधान

पंजाबी में एक कहावत है "चोर उचक्के चोधरी ते लुच्ची रन प्रधान" . पता नहीं पूर्व में कहावतों का विस्तार या फिर कहें निर्माण कैसे हुवा होगा. कुछ भी नहीं कहा जा सकता. समाज के हालात देख कर कुछ समझदार लोगों नें कुछ वाक्य कहें होगे – जो प्रचलित हो गए इत्यादी. पर आज में इस कहावत की बात इस लिए कर रहा हूँ – की आज की राजनितिक परिपेक्ष में ये कहावत बिलकुल सटीक बैठेती है.
पहले बात उतरप्रदेश की मुख्यमंत्री बहिन मायावती की. इनके २००७ में विजयी पर मुझे बहुत प्रसंता मिला थी. ये नहीं की में बी एस पी कर कार्यकर्ता हूँ – बल्कि इसलिए की देखो दलित पिछड़े वर्ग की एक महिला अपने दम ख़म पर इतने बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बन्ने जा रही है. फक्र हुवा अपने देश और अपनी संस्कृति पर. पर आज जब नेता लोग आजादी की पूर्व संध्या पर सन्देश दे रहे थे – बहिनजी नें किसानों पर गोलियाँ बरसा कर जलियांवाला बाग की याद दिला दी. गेटर नोएडा से आगरा के बीच बन रहे यमुना एक्सप्रेस-वे के लिए जमीन के अधिग्रहण को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा. किसानो को एक्सप्रेस-वे से कोई परेशानी नहीं है, परन्तु एक्सप्रेस-वे के नाम पर जो उपजाओ भूमि जे पी ग्रुप को दी जा रही है वहाँ एक बिल्डर से क्या अपक्षा की जा सकता है – प्लाट कटेंगे – माल बनेगे – महंगी कालोनियां बनेगी. और येही धरती पुत्र इनको दूर से निहारेंगे. हो सकता है यहाँ की महिलाएं इन कालोनी में बाई का काम करें- यहाँ के पुत्र कल इन कालोनी में सब्जी बेचें. हाँ, यहाँ कोई उद्योगिक क्षेत्र विकसित किया जाता – जहाँ नौजवानों को रोजगार की उम्मीद होती तो बात अलग थी. इन ग्रामीणों के लिए कोई रोज़गार के अवसर पैदा किया जाता तो इनता कलेश नहीं था. किसानो से जमीन ले ली गई तो क्या करेंगे. न तो अब तक सरकार नें इनके हाथ में कोई तकनिकी हुनर दिया है – न ही ज्यादा पड़े लिखे हैं की कहीं ढंग की नौकरी कर लें.
बात इतनी है की जे पी ग्रुप और मायावती सीधे सीधे उपजाऊ भूमि बेच कर भागीदारी से पैसा बना रहे है. किसानो और मजदूरों की किसको चिंता है. कल ये लोग हतियार उठा लेंगे तो – माओवादी कहेलायेंगे.

दूसरी हमारी मनानाया सोनिया गाँधी जी हैं.
राष्ट्रमंडल खेलों को लेकर चल रहे भ्रष्टाचार आरोप के मामलों सोनिया गांधी ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों से जुड़े कार्यों में यदि कोई भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाएगा, तो उसे खेलों के आयोजन के बाद सजा दी जाएगी. पहले क्यों नहीं. समझ नहीं आता की हमारे देश में सांप के निकल जाने के बाद ही क्यों लकीर पीती जाती है. सोनिया गांधी ने यह भी कहा कि राष्ट्रमंडल खेलों का संबंध किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति से नहीं है. यह एक राष्ट्रीय गौरव है और इन्हें सफ़ल बनाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए. मैडम आपको क्या पता राष्टीय गौरव किस चिड़िया का नाम है. अगर इतनी ही चिंता इस गौरव की होती तो आज अफजल गुरु फंसी पर लटक चूका होता. और आपके संत्री मंत्री किसी चिता हैं इस शब्द की.
कलमाडी साहिब छाती ठोक कर कह रहे हैं : उनकी नेता सोनिया गाँधी व मनमोहन सिंह कहेंगे तो वो इस्तीफा दे देंगे. अपना ज़मीर तो खत्म हो चूका है या कह लें की मर चूका है. अब नेता कहेंगे तो. नेता को क्या जरूरत है – तुम्हारे से इस्तीफा मांगने की.
उधर, राज्यसभा सदस्य अय्यर ने कहा, "अगर राष्ट्रमंडल खेल सफल हुए तो निजी तौर पर मुझे इसकी कोई खुशी नहीं होगी।" उन्होंने कहा, "मैं इन दिनों हो रही बारिश से बहुत खुश हूं। इसकी पहली वजह यह है कि बारिश खेती के लिए अच्छी है। दूसरी बात यह कि इससे राष्ट्रमंडल खेलों का विफल होना भी सुनिश्चित हो जाएगा।" ये विचार विपक्षी नेता के नहीं है – ये राज्यसभा में सारकार के नुमाइंदे हैं.
कितने उच्च विचार है. धन्यवाद अय्यर साहिब.
तस्वीर का एक अन्य पहलू हैं : हमारी दिल्ली की मुख्यमंत्री श्री मति शीला दीक्षित जी, नजाकत और नफासत की मिसाल. जिन्होंने दिल्ली में खेलों के लिए दिल्ली के विकास की परियोजनाओं के लिए पहले ही १६ हजार करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। शीला ने सभी परियोजनाओं के पूरा होने की पिछले महीने की समयसीमा ३१ अगस्त बताई थी। देख लेंगे ३१ अगस्त को भी. करोडो अरबो रुपे खर्च हो चुके हैं पर अभी तक कोई भी नेता छाती ठोक का ये नहीं कह सकता की इन खेलों से हमारा “राष्ट्रीय गौरव” सही सलामत रह जायेगा.
खुदा खैर करे. हमारा क्या है ... खामखाह गरियाते रहते है।

इक़बाल की इन चंद पंक्तियों के साथ विराम
वतन की फ़िक्र कर नादां ! मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिन्दोस्तां वालों
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दास्तानों में

जय राम जी की

7.8.10

कविता नहीं भी लिखनी आती - तो भी लिखो



















आओ तनहाई में मिले
फिर हम दोनों

मौन होकर
जहाँ चाँदनी भी न पहुंचे..
चाँद को भी चुगली की आदत है
फिर मिलें हम दोनों
तुम जज़्बात के उजाले को
अपने घर रख के आना
ज़माने की रावयेतें
जो एक अरसे से मेरे जिस्म पर चस्पा है

कहीं पढ न लो तुम, फिर
अँधेरे में ही आना....
आना अपरिचित बन
कुछ अपनत्व महसूस करेंगे

मैं ये और तुम ये
यहीं से शुरुवात हुई थी
हमारे अलगाव की
अपने अपने ख्याल की
और उस पुरे चाँद की रात में
तुम्हीं नें फाड़ दिए थे सारे पत्र
........
और उस रोज़,

दूर किसी ने कहा ,
और कईयों ने सुना.........
ज़माने पर एतबार करना

क्यों भाई, कितना सकूं मिलता है खामखा की कविता लिख कर भी. कश्मीर जल रहा, लेह बह गया है, बिहार बाद की चपेट में है. झारखण्ड में अलग खेल चल रहा है, २४ कांवरिये - भोले बाबा को प्यारे हो गए, शरद पवार से सबका ध्यान हट गया है, कलमाड़ी सोनिया गाँधी की तरफ देख रहा है - आप बोले तो इस्तीफा दूं, नहीं तो में यूँ ही माल बनाता रहूँगा - मिडिया चिल्लाये तो चिल्लाये.................. सब कुछ हो रहा है. गिल साहिब ने एक उद्घाटन में ही कह दिया, इन स्टेडियम (छत चूते हुवे) को देखने को ही तरस गया था, पर शीला मैया के चहरे पर परेशानिया नज़र आने लग गई है। खिलाड़ी उदास है..........
पर बाबा तुम परेशान मत हो.........
कविता नहीं भी लिखनी आती - तो भी लिखो
पर इन सब पर मत लिखो.....

5.8.10

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,


कहते हैं मन बहुत ही आवारा किस्म का होता है - अभी तक विज्ञान की कोई मशीन मानव मन को समझ नहीं पाई है - इन कोमन घोटालो खबर के बावजूद भी ये कामन मन शाएरी करने बैठ गया। क्या बातें . अगर लिख ही दी है तो छाप देतें है - आपकी काम्मेंट्स - उत्साहित करेंगी.






बेतरतीब कागजों को सवारने का हुनर तो है दीपक
ये उलझी हुई ज़िन्दगी संवारूं तो चैन आये.

तेरी मासूमीअत - तेरा चेहरा बयाँ करता है -
जमाने के लोग कहेते हैं- आशिक बरबाद लगता है

दाग जो चेहरे पर हैं हट जायेंगे दीपक
उन जख्मों का क्या जो इस दिल ने खाएं है

तेरे साथ दो चार कदम क्या चला दीपक
जुल्फों को छूकर आई तल्ख़ हवा से दिल भर आया

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,
ये आवारा कागज़ के टुकड़े दिल का चैन लूट लेंगे

घर से न निकल इन बहारों में दीपक
बर्बाद आशिकों को ये फिजा नहीं सुहाती