20.8.10

बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे (पगार बढ़ गई है)

“छट्ठे वेतन आयोग के बाद तो तनख्वाह बढ़ गई है साहिब – अब हम गरीब आदमियो से थोड़ी दया दिखाया कीजिये” एक ट्रक का कुलिनेर चुंगी पर पर बैठे बाबु से बोला. जाहिर सी बात बाबु का जवाब गलियों से आया होगा।

आज जब हमारे सांसदों का वेतन बड़ा है तो उपरोक्त टिपण्णी याद आ गयी. आज जनता सवाल भी कर रही है “बाबू साहिब – अब तो नहीं लूटोगे।”

“साहेब जितना पैसा मिलता है – उतना काम तो करोगे?” हल्ला गुल्ला कर के संसद थप तो नहीं करोगे।

“पहेले पूरी नहीं पड़ती थी ... महीने के आखिर में पैसा खत्म हो जाता था. आप घूस खा कर सवाल पूछते थे, बाबू साहिब हम भी आप की मजबूरी समझते थे. – बाबू साहिब, अब तो घूस नहीं खावोगे।”

“साहिब हमे तो मीट-चिकन खाए हुवे मुद्दत हो जाती है. आप को तो संसद में १०-१५ रुपे में चिकन मिल जाता है” क्या अब उस गरीब कैंटीन वाले के भी रेट बारहवा दोगे?”


साहिब २ दिन पहले फैक्ट्री में नाईट शिफ्ट में नींद आ गयी थी – मालिक ने पगार में दिहाड़ी काट ली – बोला साला फैक्ट्री को संसद समझ कर सो गया था.” सरकार आप की पगार बढ़ गई है – तो संसद में सोया तो नहीं करोगे। '


बाबू साहिब बताइए...

हमारे हमारे भी सवाल है – जवाब दीजिए ..... (कम पगार होते हुवे भी हम बिना घुस खाए सवाल पूछ रहे है.) आप की शक्ल डेड साल पहले देखि थी. अभी तो सादे तील साल रहते है... फिर आप हमारे पास आयेंगे. तब तक तो महंगाई डयान और बड़ी हो जायेगी और पगार फिर कम लगने लगेगी. साहिब इस डयान को मरवा क्यों नहीं देते.

जैसे की जो काम आप कानूनी रूप से नहीं करवा पाते – उसके लिए किसी गुंडे को सुपारी दे देते हो।
माए बाप इस महंगाई डयान को मरवाने की सुपारी कब देंगे।

आपसे ये नाचीज़ सवाल पूछ बैठा – गुस्ताखी करने की माफ़ी चाहता है.