5.8.10

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,


कहते हैं मन बहुत ही आवारा किस्म का होता है - अभी तक विज्ञान की कोई मशीन मानव मन को समझ नहीं पाई है - इन कोमन घोटालो खबर के बावजूद भी ये कामन मन शाएरी करने बैठ गया। क्या बातें . अगर लिख ही दी है तो छाप देतें है - आपकी काम्मेंट्स - उत्साहित करेंगी.






बेतरतीब कागजों को सवारने का हुनर तो है दीपक
ये उलझी हुई ज़िन्दगी संवारूं तो चैन आये.

तेरी मासूमीअत - तेरा चेहरा बयाँ करता है -
जमाने के लोग कहेते हैं- आशिक बरबाद लगता है

दाग जो चेहरे पर हैं हट जायेंगे दीपक
उन जख्मों का क्या जो इस दिल ने खाएं है

तेरे साथ दो चार कदम क्या चला दीपक
जुल्फों को छूकर आई तल्ख़ हवा से दिल भर आया

दिल की खिड़की को बंद रख दीपक,
ये आवारा कागज़ के टुकड़े दिल का चैन लूट लेंगे

घर से न निकल इन बहारों में दीपक
बर्बाद आशिकों को ये फिजा नहीं सुहाती

1 टिप्पणी:

  1. आदरणीय सर ,

    बहुत - बहुत धन्यवाद . आप जैसे ज्ञानी लोगों के टिप्पणी से ही मुझे कविता की नई प्रेरणा मिलती है , मैंने आपका ब्लॉग देखा , अतुलनीय कार्य कर रहे हैं आप .

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बक बक को समय देने के लिए आभार.
मार्गदर्शन और उत्साह बनाने के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है.