16 नव॰ 2010

लक्ष्मी नगर हादसा - क्या सबक सीखेगी सरकार ...... या २ लाख हर दिल्ली वाले की जान की कीमत है.

इसको आप कविता नहीं समझे ये जज्बात है उन परिवारों के लिए जो लक्ष्मी नगर की उस बिल्डिंग में रहते थे.... कल रात काल का ग्रास बन गए.... हुतात्माओ को प्रणाम – इश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे ... यहाँ तो शांति नहीं पा सके..... एक अच्छे भविष्य के लिए लड़ते रहे.... सूरज के ढलने के देर बाद तक काम किया.... की आने वाली नस्ल कुछ अच्छा पा सके ... कुछ अच्छा जी सके.... आज सरकार इन परिवार को २ २ लाख दे रही है..... पता नहीं कब तक ये पैसे उन तक पहुंचेगे और कितने पहुंचेगे... आंसू बहाने सभी आये.... पर ऐसे दुबारा न हो – ये कोई नहीं कह सकता.

जीवन में
जीने के लिए
बहुत मेहनत की उन्होंने
और पिछली रात जमींदोज हो गए......
ईंट दर ईंट लगा कर
कई ऊँची इमारतों को आकार दिया था ...
सीमेंट में पसीना मिला
उन दीवारों पर लेप किया था....
उनके हाथ में गैती और फावड़ा...
चलता था धरती की छाती पर
और कल धरती ही निष्ठुर हो गयी..
उन थकान भरी शामों की कसम
वो देसी ठरों की खाली बोतलें
आज उदास हैं.......
जिन्हें पी कर घर पहुँचते थे 
हँसते गाते...
वह आशियाना जब
कल दफ़न हो गया ...

क्या कोई बता सकता है की दिल्ली में जो फ्लैट बन रहे हैं – उनकी निति क्या है... आज कोई भी बिल्डर बन जाता है... कोई भी .. योग्यता ये है ...
झूठ बोलना जनता हो, धूर्त हो,
छोटे-मोटे नेता से सम्बन्ध हो.....
पैसा किसी से भी उधार ले सकता हो...
आपके पास ५० गज का मकान है दिल्ली में – तो वो आपके पास आएगा और आफर करेगा... एक फ्लोर मैं लूँगा. २ आपको बना कर दूँगा.....
ऐसी बिल्डिंग का क्या भविष्य होगा – ये आपने देख लिया.....
क्या हम विकसित देश के नागरिक हैं...... जब कोई हादसा होता है तो मदद पहुँचने के लिए ८-१० घंटे लगते हैं - वो भी विकसित देश की राजधानी में..... पता नहीं डिस्कवरी चेनल वाले कौन सी दुनिया की तस्वीरें दिखाते है.... जहाँ हादसे में १ १ आदमी की जान की कीमत होती है .... क्या वो विकसित देश होते है.... या हमारे देश जैसे. यहाँ तो बस राम जी की महिमा है.... इंसानियत जिन्दा है.. लोग भाग पड़ते हैं..... जितनी बनती है उतनी मेहनत करते हैं. 
अब समय है - दिल्ली सरकार को चेतना चाहिए...... संकरी गलियों में ऊँची ऊँची बिल्डिंग बन गयी है..... किसी भी समय किसी खौंफनाक हादसे के इन्तेज़ार में.... 


foto courtsey: google.co.in

9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही दुखद घटना है. मगर सरकार को जरा भी सुध नहीं. कमिटी बैठेगी, जाँच होगी और मुआवजा मिलेगा फिर काम खत्म. पिछली गलतियों से कोई सबक नहीं लेता . पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो गया है. हो सकता है बिल्डर की किसी नेता और पुलिस से मिलीभगत हो. दिल को छु लेने वाली कविता...

    जवाब देंहटाएं
  2. bhai hum to yeh sochate hai ki jinda hi to aap ke nahi to sarkar ke do lakh pakke .

    जवाब देंहटाएं
  3. फुटपाथ पर भूखे पेट पर गीला गमछा लपेटकर सो जाने वाला शख्स माचिस की डिबिया को घर कहता है.. और माचिस की डिबिया सीली तो बेकार टूटी तो बेकार.. इंसानी जान की कीमत दो लाख रुपये घोषणा के और दो सौ हाथ में मिलने के... बीच के दलाली में चले जाते हैं... बड़े बड़े शहर में इस तरह की छोटी मोटी घटनाएँ होती रहती हैं दीपक बाबू! कितना सोच सोच कर दिमाग़ ख़राब करेंगे.. मेरे ब्लॉग पर एक महापुरुष लिख गए थे एक बात सो यहाँ चिपका रहा हूँ.. सलिल जी, आज के माहोल में इतनी सवेदनशीलता अच्छी नहीं ....... इंसान को कहीं का नहीं छोडती........ हम तो छोड़ नहीं पाए........

    जवाब देंहटाएं
  4. deepak bhai
    dil ko chhoo lene vali kavita hai.aaj ke a rajaon, kalmadiyon, chavhanon ke dour me yah log kab tak jinda rahte.

    जवाब देंहटाएं
  5. इस हादसे की जानकारी नहीं थी, अभी ही मालूम चला। वैसे मालूम होता भी तो क्या कर लेते? थोड़ी देर मूड ऑफ़ रहेगा, फ़िर अभी कुछ रंगीन सा दिख जायेगा टीवी पर, चटपटा सा तो सब भूल जायेंगे।
    ये शहर हादसों के ही शहर हैं। लेकिन हम इतने स्ट्रांग हो रहे हैं कि किसी दिन अखबार में ऐसी कोई खबर न दिखे तो लगेगा कि कोई बड़ा हादसा हो गया है।
    छोड़ो बाबाजी, ओलंपिक की तैयारी करें हम लोग या फ़िर किसी फ़िल्म फ़ेस्टीवल की।

    जवाब देंहटाएं
  6. @सलिल जी, आज के माहोल में इतनी सवेदनशीलता अच्छी नहीं ....... इंसान को कहीं का नहीं छोडती........ हम तो छोड़ नहीं पाए...

    "किसी धूर्त नेता की शागिर्दी करनी पड़ेगी. तब जाकर इस दुनिया में लायक बनेगे.

    जवाब देंहटाएं
  7. ओह ....!!
    बेहद दर्दनाक घटना थी यह .....
    और उस पर आपकी यह रचना भी बेमिसाल .....

    उन थकान भरी शामों की कसम
    वो देसी ठरों की खाली बोतलें
    आज उदास हैं.......
    जिन्हें पी कर घर पहुँचते थे
    हँसते गाते...

    ये पंक्तियाँ तो छू गयीं ....
    सच्च इस गरीबों की ज़िन्दगी इन ठर्रों के बिना चली ही कहाँ है .....

    जवाब देंहटाएं
  8. दिल्ली में लक्ष्मी नगर बस्तियां नहीं हैं ये बस वोट-बैंक हैं. इलेक्शन आए नही कि हर दो-दो चार-चार छटांक के छुटभइये चले आते हैं इन्हें नियमित करने, आखें मूंद कर. ये एक पूरा धंधा है.

    दिल्ली के किसी भी गांब में चले आइए मुनीरका, नारायणा, हौज़ खास, टोडापुर-दसघरा, पोसंगीपुर, बेर सराय, आई आई टी.... कहां तक नाम गिनाऊं. हर जगह यही हाल है. 8 बाई 8 के से कमरों में कई कई लोग रहते हैं. कमरों में हवा रोशनी को जगह कहां, आदमी ही ठुस लें तो बहुत.

    मकान वालों का तो ये धंधा है, ठाठ से बिजली की चोरी, इन्कम टैक्स की चोरी, हाउस टैक्स की चोरी और जब चाहा दो-चार मंजिलें और जोड़ दी. नोट छपने शुरू.

    कहीं भी गली 8-10 दस इंटें और एक बोरी रेत गिरा दो कुछ ही मिनटों में पुलिसिए सूंघते चले आएंगे. लेकिन बिल्डिंग गिर गई तो थाने खबर पहुंचने में 3 घंटे लगते हैं.

    साहब, यहां कोई सोया नहीं है. सब जगे हुए हैं इसलिए समस्या ये हैं कि इन जगे हुओं को जगाया कैसे जाए...

    जवाब देंहटाएं

बक बक को समय देने के लिए आभार.
मार्गदर्शन और उत्साह बनाने के लिए टिप्पणी बॉक्स हाज़िर है.