20.10.10

आज इन शहनाइयों को बजने दो...

बहुत मुश्किल है दिल में पैदा हुवे जज्बातों को शब्द देना या फिर लफ़्ज़ों में अपनी भावनाओं को व्यक्त करना. सचमुच बहुत ही मुश्किल है......... कहीं शब्द कम पड़ जाते है ..... कहीं लय नहीं बन पाती ... पर क्या करें भावुक मन है .... और भावना में बह कर लिख रहे हैं.... इस आशा के साथ की गुस्ताखियाँ माफ होंगी.


आज इन शहनाइयों को बजने दो............
इस अँधेरी रात में
चाँद मुबारक हो तुम्हे
हमारे दिल की इस बेकरारी में
तुम्हे दिल का करार आ जाये ..
तुमने आशिकी की हमसे
और सेहरे कि लड़ियों में सजती
हमारी हसरतों को परवाज़ चढ़ने दो
बहकते उन जज्बातों में भी
तुम जो न रुसवा हुवे ज़माने से
और हमसे ही रूठ गए ख्वाब हमारे ..
जी जायेंगे हम इन अंधेरों में
लेके नाम तुम्हारा
तुम्हे सब रोशनियाँ मुबारक हों
आज इन शहनाइयों को बजने दो............
जरूरी नहीं है
हर अफ़साने का एक मुकाम हों...
हमें इस सेहरा में ...
यूँ तन्हा गर्द हों जाने दो ..
आज इन शहनाइयों को बजने दो............