1.10.10

फिजा में तैर रहे थे कुछ हर्फ़ महफूज़ से


फिजा में तैर रहे थे कुछ हर्फ़ महफूज़ से
दिल्लगी से मैंने छुए और -
हाथ में आये तो दास्तां बन गए.
कहीं हीर रांझा लिख दिया
और कहीं
सोहनी ते महिवाल लिख दिया.

कहीं कब्रों से उठ बैठा बुल्लेशाह...
इक नई इबारत पढ़ने के लिए.
इक नई इबारत गड़ने के लिए.

वो रांझा आज भी मारा फिरता है .
अपनी हीर की तलाश में.
जो मशरूफ है अपनी जिंदगानी में
अपनी जवानी में..
तख़्त हजारे को याद कर के
वो आज भी रोता है

हीर अब  चेटिंग से
रोज इक नई दास्तां बनाती है.