31.10.10

क्रांति.......... हर क्षेत्र में........

इस धरा पर अगर मेरे जैसे लोग जन्म ले कर शांति के लिए अनाप शनाप तरीके आजमा रहे है तो गलत है ....... सवेदनाओ को एक किनारे कर के समाज में एकरस हो जाना ही जीने की कला है... या फिर भावनाओं में जकड कर अपने को समाज से किनारे रखना .... दूसरी कला. अब अपने पर निर्भर करता है की कौन सी कला में निपुण होकर जीने लायक है.
हम है उस प्रभु के दासा.......
देखन आये जगत तमाशा..
इस तर्ज़ पर दूर से दुनिया को देखना और उस में खुद निर्लेप न होना. या खुद को दूर ही रखना - हर वाद, धारा, सम्युदाय, क्षेत्र से.

विश्व साहित्य प्रसिद्ध साईंस फिक्शन कृति ब्रेव न्यू वर्ल्ड के लेखक आल्डूअस हक्सले साहब के कथन हैं -
गंगा में मोक्ष की अभिलाषा लिए लोगों को डुबकी लगाते देख उनका चिन्तक मन क्लांत हो गया ..उन्होंने आगे लिखा -
"
भारतीयों ने जीवन के संघर्ष से मुंह मोड़ काल्पनिक सत्ताओं का सृजन कर लिया -आत्मा परमात्मा और मोक्ष जैसी धारणाएं इसी का परिणाम है !"

मित्र सुरेश नागपाल जी के शब्द है....
क्यों, भई, क्यों चाहिए तुम्हे शांति......... कर्म करो....... शांति वान्ति कहीं नहीं है. तुम कहते शांति ..... नहीं मिलती ... और अब मेरे ख्याल से मिलनी भी नहीं चाहिए. यहाँ मानव जन्म में शांति का क्या काम. कर्म की बात करनी चाहिए..... शांति तो उन संतो को भी नहीं मिलती जो दूर कंदराओ में बैठे है. जो संन्यास धारण करके भी अखाड़ों और पदवी की राजनीति में उलझे रहते है.. और तुमने तो मात्र अपने नाम के आगे मात्र बाबा लगाया है.
अन्न धन और वैभव से परिपूर्ण सेठ का पता नहीं क्या हुवा...... शांति की तलाश में चल पड़ा. दूर किसी जंगल में जाकर राम जी के चरणों में धूनी जमा कर बैठ गया और.... प्रभु को सेठ की जिद्द के आगे नतमस्तक होकर दर्शन देने पड़े. तपस्या से खुश होकर उस नगर सेठ को राष्ट्र सेठ बनाने के धन-धन्य इत्यादी .. सेठ में कहा प्रभु मुझे ये सब नहीं चाहिए.......
मुझे बस शान्ति चाहिए.. राम जी ने कहा ... सेठ, तुमने रामायण पढ़ कर ऐसा सोच रहे हो........ मानव जन्म में तो मुझे कहाँ शान्ति मिली थी......सारी जिंदगी मात्र परेशानी, संघर्ष के अलावा क्या थी..... क्या मैं भी शांत मन से अजोध्या में एक किनारे बैठ कर जिंदगी नहीं काट सकता था..........
सत्य है....... इश्वर ने अवतार लिए है.. मात्र हमको रास्ता दिखाने को ही हैं.


...... और हम लोग अंधभक्ति में पड़ कर घंटी बजाने लग जाते हैं और उस कहानी के तत्व ज्ञान को भूल जाते हैं........
शान्ति नहीं............
अब क्रांति की बात होनी चाहिय........
भारत वर्ष में हर क्षत्र में क्रांति चाहिए.........
हम यानी लगभग १.२५ अरब की संख्या वाला देश जिसमे लगभग पच्चास प्रतिशत युवा माने तो २५ साल से भी कम की उम्र के हैं...............
और यही युवा पीडी किसी न किसी बाबा, संत फकीर के चक्कर में पड़ी है....... कहीं जागरण और कहीं साईं संध्या के लिए दिन रात एक कर रहे हैं. 
और हमरा अपना देश बनाने के लिए चीन से श्रमिक भी आने लग गए....... 
इस धार्मिक नशे और आलस्य का जीवन छोड़ कर एक नाद कर देना चाहिए.............
क्रांति.......... हर क्षेत्र में........
हम लोग छोटे-छोटे कार्य में निपुण होकर बड़े-बड़े प्रोजेक्ट को बनायेंगे..........


बहरहाल, जय राम जी की