1.8.11

युटीवी बिंदास - गुटरगूं - फिर वही बेवफाई ....

सारा दिन कबूतर तुम्हारे फ्लेट की बालकोनी पर आकार गुटरगू करते रहते हैं .... गंद मचाते है..... तुम्हे कोफ़्त नहीं होती...... भगाते क्यों नहीं इनको..
बहुत भगाया....... पर नहीं भागते......
अरे यार, इनके घोंसले तोड़ दो...... दो चार दिन यहीं बैठे रहो... भाग जायेगे..
ये आवारा कबूतर हैं, इनका कोई घोंसला नहीं है.... विचारों की तरह....... कभी मेरे पास तो कभी किसी और के पास.... आवारागर्दी करते हैं........ ये कोई चुग्गा नहीं चुगते....... शब्द ढूंढते है...... और मैं निशब्द.... बस ताकता रहता हूँ, अपने कमरे से.
निज में मन के विचारों का जो अंतरद्वंद उपजता है... वही प्रयत्क्ष  कबूतरों का शोर है.... न मुझे शब्द मिलते है न ही इनको चुग्गा.... कई बार सोचता हूँ कि सामने की छत पर क्यों नहीं जाते.... जहाँ प्रयाप्त दाना पड़ा है.
पर ये बेफिक्री से यही अड़े रहते है - पड़े रहते है -  मन में ज्यों विचारों का तूफ़ान चलता रहता है - मनो ये दाने के लिए और विचार कविताओं के लिए. और सुनो कई बार तो ये लड पड़ते है.....तूफ़ान सा मच जाता है ... ज्यों प्रेमिका - अपने प्रेमी को थप्पड़ मार देती है - और प्रेमी कहता है - तुझसे तो पहले ही ब्रेक ले लिया था....
हाँ युटीवी बिंदास टीवी के स्टूडियो में .. ठीक वैसे ही.
तुम्हे ध्यान होगा... तोता मैना की कहानिया..... राजा के बर्बादी कि और रानी की बेवफाई के किस्से...
नहीं, राजा भी बेवफा थे...
हाँ वही सब किस्से ... तो तोता मैना को सुनाती थी और मैना हुंकार भरा करती थी... याद है .
अब वही सब किस्से है - बिंदास ....... बिंदास टीवी पर ..... वही सब .. वही बेवाई की बातें..... पर अब प्रतक्ष है... सभी कुछ... बेवफाई और नंगाइ जो पहले दबे शब्दों में ब्यान होती थी - चुपके से ...... और अब वही बिंदासपन टीवी पर दीखता है.... समाज में नयी पीढ़ी के शिल्पकार - उपदेश दे रहे है - कावों की तरह कांव कांव कर रहे है और तुम अभी कबूतरों को भगाने की बात कर रहे हो.....  सही मायने में सेंसर करना चाहते हो शब्दों को .........पर उनके नहीं क्योंकि वो बिंदास है.